जवाहरलाल नेहरू का एडविना माउंटबेटन से कैसा रिश्ता था?
भारत आने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने जब गवर्नमेंट हाउज़ में पहली गार्डेन पार्टी दी तो लोग ये देख कर दंग रह गए कि जवाहरलाल नेहरू एडविना के कदमों पर ज़मीन पर बैठ कर डांस शो का आनंद उठा रहे हैं.
हालांकि कुर्सियों की कमी पड़ जाने की वजह से भारत के भावी प्रधानमंत्री ने ऐसा किया था, लेकिन लोगों की नज़र से ये छिप नहीं सका कि आखिर नेहरू एडविना के ही पैरों के पास क्यों बैठे.
पार्टी के तुरंत बाद एडविना अपनी बेटी पामेला के साथ नेहरू के घर गईं थीं. दिलचस्प बात ये थी कि इस बार लॉर्ड माउंटबेटन उनके साथ नहीं थे.
वैसे तो लॉर्ड वेवेल के ज़माने से ही नेहरू गवर्नमेंट हाउज़ के स्वीमिंग पूल में तैरने जाया करते थे, लेकिन तब कोई इस बारे में बात नहीं करता था.
लेकिन जब एडविना माउंटबेटन भी इस स्वीमिंग पूल में नेहरू के साथ तैरती हुई देखी जाने लगीं तो लोगों ने इन दोनों के संबंधों के बारे में बातें करनी शुरू कर दी.
सलमान रुश्दी के चचा शाहिद हमीद ने 31 मार्च, 1947 को अपनी डायरी में लिखा था, "माउंटबेटन दंपत्ति के भारत पहुंचने के 10 दिनों के भीतर ही एडविना और नेहरू की नज़दीकियों पर भौंहें उठना शुरू हो गई हैं."
रेडक्रॉस के एक समारोह में खींची गई तस्वीरों में ये साफ़ क़ैद हुआ कि किस तरह एडवीना नेहरू को प्यार से निहार रही हैं.
कद्दावर कांग्रेस नेता अबुल कलाम आज़ाद की आँखों से भी ये बात छिप नहीं सकी और उन्होंने अपनी किताब 'इंडिया विन्स फ़्रीडम' में लिखा, "नेहरू माउंटबेटन से तो मुतासिर हैं ही, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा वो लेडी माउंटबेटन से मुतासिर हैं."
नेहरू की आकर्षक शख़्सियत का असर न सिर्फ़ माउंटबेटन दंपत्ति पर पड़ा, बल्कि उनकी 17 साल की बेटी पामेला हिक्स भी उनसे बहुत प्रभावित हुई थीं.
अपनी किताब 'डॉटर ऑफ़ एम्पायर' में पामेला लिखती हैं, "जब नेहरू ने पहली बार मुझसे हाथ मिलाया था मैं तभी से उनकी आवाज़, कपड़े पहनने के तरीके, सफ़ेद शेरवानी और उसके बटनहोल में लगे लाल गुलाब और उनकी गर्मजोशी की मुरीद हो गई थी."
एक बार बीबीसी से बात करते हुए पामेला ने बताया था, "मेरी माँ और पंडितजी एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे. पुराना मुहावरा 'सोलमेट' उन पर पूरी तरह लागू होता था. मेरे पिता बहुर्मुखी थे, जबकि मेरी माँ अपने-आप में ही रहना पसंद करती थीं."
"वो बहुत लंबे समय तक विवाहित रहे थे और एक दूसरे के बहुत नज़दीक साथी भी थे लेकिन इसके बावजूद मेरी माँ अकेलेपन की शिकार थीं. तभी उनकी मुलाक़ात एक ऐसे शख़्स से हुई जो संवेदनशील, आकर्षक, सुसंस्कृत और बेहद मनमोहक था. शायद यही वजह थी कि वो उनके प्यार में डूब गई."
इस बीच भारत में राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद लोगों की नज़र एडविना और नेहरू पर थी.
नेहरू के जीवनीकार स्टेनली वॉलपर्ट अपनी किताब 'नेहरू-अ ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' में लिखते हैं, "मैंने एक बार नेहरू और एडविना को ललित कला अकादमी के उद्घाटन समारोह में देखा था. मुझे ये देख कर आश्चर्य हुआ था कि नेहरू को सबके सामने एडविना को छूने, उनका हाथ पकड़ने और उनके कान में फुसफुसाने से कोई परहेज़ नहीं था."
"माउंटबेटन के नाती लॉर्ड रेम्सी ने एक बार मुझे बताया था कि उन दोनों के बीच महज़ अच्छी दोस्ती थी, इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन खुद लॉर्ड माउंटबेटन एडविना को लिखी नेहरू की चिट्ठियों को प्रेम पत्र कहा करते थे. उनसे ज़्यादा किसी को अंदाज़ा नहीं था कि एडविना किस हद तक अपने 'जवाहार' को चाहती थीं."
हालांकि कुर्सियों की कमी पड़ जाने की वजह से भारत के भावी प्रधानमंत्री ने ऐसा किया था, लेकिन लोगों की नज़र से ये छिप नहीं सका कि आखिर नेहरू एडविना के ही पैरों के पास क्यों बैठे.
पार्टी के तुरंत बाद एडविना अपनी बेटी पामेला के साथ नेहरू के घर गईं थीं. दिलचस्प बात ये थी कि इस बार लॉर्ड माउंटबेटन उनके साथ नहीं थे.
वैसे तो लॉर्ड वेवेल के ज़माने से ही नेहरू गवर्नमेंट हाउज़ के स्वीमिंग पूल में तैरने जाया करते थे, लेकिन तब कोई इस बारे में बात नहीं करता था.
लेकिन जब एडविना माउंटबेटन भी इस स्वीमिंग पूल में नेहरू के साथ तैरती हुई देखी जाने लगीं तो लोगों ने इन दोनों के संबंधों के बारे में बातें करनी शुरू कर दी.
सलमान रुश्दी के चचा शाहिद हमीद ने 31 मार्च, 1947 को अपनी डायरी में लिखा था, "माउंटबेटन दंपत्ति के भारत पहुंचने के 10 दिनों के भीतर ही एडविना और नेहरू की नज़दीकियों पर भौंहें उठना शुरू हो गई हैं."
रेडक्रॉस के एक समारोह में खींची गई तस्वीरों में ये साफ़ क़ैद हुआ कि किस तरह एडवीना नेहरू को प्यार से निहार रही हैं.
कद्दावर कांग्रेस नेता अबुल कलाम आज़ाद की आँखों से भी ये बात छिप नहीं सकी और उन्होंने अपनी किताब 'इंडिया विन्स फ़्रीडम' में लिखा, "नेहरू माउंटबेटन से तो मुतासिर हैं ही, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा वो लेडी माउंटबेटन से मुतासिर हैं."
नेहरू की आकर्षक शख़्सियत का असर न सिर्फ़ माउंटबेटन दंपत्ति पर पड़ा, बल्कि उनकी 17 साल की बेटी पामेला हिक्स भी उनसे बहुत प्रभावित हुई थीं.
अपनी किताब 'डॉटर ऑफ़ एम्पायर' में पामेला लिखती हैं, "जब नेहरू ने पहली बार मुझसे हाथ मिलाया था मैं तभी से उनकी आवाज़, कपड़े पहनने के तरीके, सफ़ेद शेरवानी और उसके बटनहोल में लगे लाल गुलाब और उनकी गर्मजोशी की मुरीद हो गई थी."
एक बार बीबीसी से बात करते हुए पामेला ने बताया था, "मेरी माँ और पंडितजी एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे. पुराना मुहावरा 'सोलमेट' उन पर पूरी तरह लागू होता था. मेरे पिता बहुर्मुखी थे, जबकि मेरी माँ अपने-आप में ही रहना पसंद करती थीं."
"वो बहुत लंबे समय तक विवाहित रहे थे और एक दूसरे के बहुत नज़दीक साथी भी थे लेकिन इसके बावजूद मेरी माँ अकेलेपन की शिकार थीं. तभी उनकी मुलाक़ात एक ऐसे शख़्स से हुई जो संवेदनशील, आकर्षक, सुसंस्कृत और बेहद मनमोहक था. शायद यही वजह थी कि वो उनके प्यार में डूब गई."
इस बीच भारत में राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद लोगों की नज़र एडविना और नेहरू पर थी.
नेहरू के जीवनीकार स्टेनली वॉलपर्ट अपनी किताब 'नेहरू-अ ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' में लिखते हैं, "मैंने एक बार नेहरू और एडविना को ललित कला अकादमी के उद्घाटन समारोह में देखा था. मुझे ये देख कर आश्चर्य हुआ था कि नेहरू को सबके सामने एडविना को छूने, उनका हाथ पकड़ने और उनके कान में फुसफुसाने से कोई परहेज़ नहीं था."
"माउंटबेटन के नाती लॉर्ड रेम्सी ने एक बार मुझे बताया था कि उन दोनों के बीच महज़ अच्छी दोस्ती थी, इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन खुद लॉर्ड माउंटबेटन एडविना को लिखी नेहरू की चिट्ठियों को प्रेम पत्र कहा करते थे. उनसे ज़्यादा किसी को अंदाज़ा नहीं था कि एडविना किस हद तक अपने 'जवाहार' को चाहती थीं."
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